
विवेकानंद नगर में प्रभु महावीर के जन्म की घोषणा होते ही गूंजे जयकारे
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में शनिवार को पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के चौथे दिन भगवान महावीर स्वामी का जन्मोत्सव भक्तिभाव और उल्लास के साथ मनाया गया। मुनि संवेगरत्न सागर के मुखारविंद से जैसे ही वीर प्रभु महावीर के जन्म की घोषणा हुई, धर्मसभा जयकारों से गूंज उठी। श्रद्धालुओं ने अक्षत और फूलों की वर्षा की। थाली और घंटनाद से पूरा उपाश्रय भक्ति के रस में डूब गया। मुनिश्री ने धार्मिक वातावरण में प्रभु महावीर के जन्म प्रसंग का वांचन किया। जन्म की घोषणा होते ही लाभार्थी परिवार ने थाल बजाकर खुशियां मनाईं। पालना जी के लाभार्थी परिवार ने प्रभु को पालने में झुलाया और मंगलगीत गाए। इसके बाद धर्मसभा में मौजूद श्रावक-श्राविकाओं ने भी पालना झुलाकर प्रभु के जन्म की खुशियां साझा कीं। श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को बधाई दी और केसरिया छापे लगाए। धर्मसभा में मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने भगवान महावीर की माता त्रिशला देवी को प्रभु के जन्म से पूर्व आए 14 महास्वप्नों का महत्व समझाया। मुनिश्री ने बताया कि इन सपनों में जैन दर्शन के गहरे आध्यात्मिक संदेश समाहित हैं। मुनिश्री ने बताया कि पहला स्वप्न सफेद हाथी का था, जो मिथ्यात्व के अंधकार से दूर होने का संकेत देता है।
दूसरा स्वप्न वृषभ का था, जो गुणों को वहन करने की सामथ्र्य का प्रतीक है। तीसरा स्वप्न केसरी सिंह का था, जो सामथ्र्य और संयम का संदेश देता है। चौथा स्वप्न लक्ष्मी माता का था, जो गुण और वैभव के साथ सम्यक दर्शन की प्राप्ति की प्रेरणा देता है। इसी क्रम में पांचवें स्वप्न में पांच वर्णों के पुष्पों की युगल माला दिखाई दी, जो अशुभ कर्मों से दूर होकर शुभ कर्मों का वरण करने का संदेश देती है। छठा स्वप्न पूर्ण चंद्रमा का था, जो शीतलता का प्रतीक है, जबकि सातवां स्वप्न सूर्य का था, जो अंधकार दूर करने का संदेश देता है। आठवां स्वप्न धर्मध्वजा का था, जो धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। नवां स्वप्न पूर्ण कलश का था, जो मंगल, पवित्रता और पूर्णता का प्रतीक माना गया। दसवां स्वप्न कमल सरोवर का था, जो संसार की मोह-माया से वैराग्य की ओर प्रेरित करता है। ग्यारहवां स्वप्न क्षीरसागर का था, जो विशालता और गहराई के साथ ज्ञान का प्रतीक है। बारहवां स्वप्न दिव्य विमान का था, जो उच्च आध्यात्मिक दिव्यता का संकेत देता है। तेरहवां स्वप्न रत्नों की राशि का था, जो अनमोल आध्यात्मिक संपदा का प्रतीक है। वहीं चौदहवां स्वप्न धूम्ररहित अग्नि का था, जो शुद्धता, तेज और आध्यात्मिक ऊर्जा का संदेश देता है।
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरडिय़ा ने बताया कि धर्मसभा में माता त्रिशला देवी के 14 महास्वप्नों के चांदी से निर्मित प्रतीकों का श्रद्धालुओं को दर्शन कराया गया। लाभार्थी परिवारों ने सभी स्वप्नों के प्रतीकों को विधिपूर्वक बधाया और मोतियों की माला पहनाई। समिति की ओर से सभी लाभार्थी परिवारों का सम्मान किया गया। उन्हें भेंट स्वरूप महास्वप्नों की प्रतिकृति भी प्रदान की गई। भगवान महावीर के जन्मवांचन और 14 महास्वप्नों के दर्शन के साथ धर्मसभा भक्ति, श्रद्धा और उल्लास के वातावरण में संपन्न हुई।







