माउंट एवरेस्ट की जीत के बाद दर्दनाक यादें…बिस्तर से बोलीं छत्तीसगढ़ की बेटी…आंखों के सामने टूटे थे साथी

 

दीपक अरोरा उजाला समय : छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले की पर्वतारोही अनिता श्रीवास ने 22 मई को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया। लेकिन इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे एक बेहद दर्दनाक और डरावना अनुभव भी छिपा है, जिसे उन्होंने काठमांडू के अस्पताल के बिस्तर से साझा किया।बेस कैंप लौटते समय खराब मौसम और ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण वे गंभीर फ्रास्टबाइट का शिकार हो गईं और फिलहाल काठमांडू के नारविक इंटरनेशनल अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।

एवरेस्ट की चोटी पर खुशी और दिमाग में संघर्ष की गूंज

अपनी सफलता के पल को याद करते हुए उन्होंने बताया कि जब उन्होंने एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया, तो उनके मन में उन वर्षों की कठिन ट्रेनिंग और संघर्ष की पूरी यात्रा चल रही थी। रोज सुबह साढ़े तीन बजे उठकर अभ्यास करना और परिवार का पूरा रूटीन बदल देना इस सपने का हिस्सा था।उनके मुताबिक यह सपना सिर्फ उनका नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मेहनत और समर्थन का नतीजा था।

डेथ जोन का डरावना सच, आंखों के सामने मौत

वापसी के सफर को याद करते हुए अनिता भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि उनके साथ कुल नौ लोग थे और इसी दौरान उनके साथी अरुण तिवारी और संदीप आरे की मौत उनके सामने ही हो गई।उन्होंने कहा कि पहले भी रास्ते में कई शव देखे थे, लेकिन जिन लोगों के साथ 40 दिन तक रहे हों, उन्हें खो देना बेहद झकझोर देने वाला अनुभव था। उस समय डर और मानसिक तनाव कई गुना बढ़ गया था।

माइनस 40 डिग्री की ठंड और फ्रास्टबाइट का संघर्ष

एवरेस्ट की चढ़ाई को उन्होंने बेहद कठिन और जोखिम भरा बताया। माइनस 40 डिग्री की बर्फीली ठंड में शरीर और दिमाग दोनों पर असर पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में खुद को स्थिर रखने के लिए उन्होंने मेडिटेशन को सबसे बड़ा सहारा बताया।

सरकार और परिवार के सहयोग ने बनाया सपना संभव

अनिता ने बताया कि वह एक साधारण परिवार से आती हैं। उनके पिता पहले सैलून चलाते थे और भाई नौकरी करते हैं। इतने बड़े मिशन का खर्च उनके लिए संभव नहीं था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार और जिला प्रशासन की मदद से यह सपना पूरा हो सका।उन्होंने इस सहयोग को अपनी सफलता का बड़ा आधार बताया।

अस्पताल में भी याद आ रहा घर का स्वाद

काठमांडू अस्पताल में भर्ती अनिता ने बताया कि 45 दिनों से एक ही तरह का खाना खाने के बाद अब उन्हें घर का भोजन बेहद याद आ रहा है। उन्हें खासकर भजिया, कढ़ी और चीला-चटनी की याद सता रही है।

बेटियों के सपनों पर बड़ा संदेश

छत्तीसगढ़ और देश के युवाओं, खासकर बेटियों के लिए उन्होंने संदेश दिया कि माता-पिता को अपनी बेटियों पर उतना ही भरोसा करना चाहिए जितना बेटों पर करते हैं। उन्होंने कहा कि बेटियों को बड़े सपने देखने और आत्मनिर्भर बनने के लिए आगे आना चाहिए।अनिता ने कहा कि हर युवा को अपने सपनों को खुद जीना चाहिए, न कि दूसरों पर निर्भर रहकर रुक जाना चाहिए।

संघर्ष से सफलता तक की प्रेरक कहानी

माउंट एवरेस्ट की यह यात्रा केवल एक चढ़ाई नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और सपनों की जीत की कहानी है। लेकिन इसके पीछे छिपा दर्द यह याद दिलाता है कि हर सफलता की कीमत बहुत बड़ी होती है।

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