सीमांत किसान नरेन्द्र सिंह को समय पर मिला खाद-बीज, खेती किसानी को मिली संबल

सीमांत किसान नरेन्द्र सिंह को समय पर मिला खाद-बीज, खेती किसानी को मिली संबल
सीमांत किसान नरेन्द्र सिंह को समय पर मिला खाद-बीज, खेती किसानी को मिली संबल

रायपुर, 06 जुलाई 2026

खेती किसानी में समय सबसे बड़ा धन होता है। यदि किसान को सही समय पर खाद, बीज और उर्वरक उपलब्ध हो जाएं तो उसकी आधी चिंता स्वतः ही समाप्त हो जाती है। एमसीबी जिले के मनेन्द्रगढ़ विकासखंड के ग्राम चौनपुर निवासी सीमांत किसान नरेन्द्र सिंह को समय पर खाद बीज मिलने से खेती किसानी को संबल मिला हैं। बता दें कि
नरेन्द्र सिंह के पास कुल 1.780 हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिसमें संपूर्ण 1.780 हेक्टेयर असिंचित भूमि शामिल है। सीमित संसाधनों के कारण समय पर कृषि आदान की व्यवस्था करना उनके लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन इस वर्ष आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित, चौनपुर शाखा मनेन्द्रगढ़ ने उनकी इस चिंता को दूर कर दिया। समिति से उन्हें खरीफ फसल के लिए आवश्यक कृषि सामग्री ऋण के माध्यम से उपलब्ध कराई गई, जिससे वे बिना किसी आर्थिक दबाव के समय पर अपनी खेती की तैयारी कर सके।
समिति द्वारा उन्हें 50 किलोग्राम की एक बोरी आई.पी.एल. पोटाश (एमओपी), 500 मिलीलीटर की एक बोतल इफको नैनो डीएपी, 45 किलोग्राम की चार बोरी एन.एफ.एल. नीम लेपित यूरिया तथा छत्तीसगढ़ राज्य बीज निगम का लोहारी कोरिया धान (एमटीयू-1156) की 30-30 किलोग्राम की दो बोरियां उपलब्ध कराई गईं। इन कृषि आदानों ने उनकी खरीफ खेती को समय पर शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बेहतर उत्पादन की उम्मीद को मजबूत किया।
नरेन्द्र सिंह का कहना है कि यदि खाद और बीज समय पर उपलब्ध नहीं होते तो बुवाई में देरी होने से उत्पादन प्रभावित हो सकता था। सहकारी समिति के माध्यम से आसानी से कृषि सामग्री मिलने से उन्हें न केवल राहत मिली, बल्कि गुणवत्तापूर्ण बीज और उर्वरक मिलने से अच्छी फसल की उम्मीद भी बढ़ी है। उनका विश्वास है कि आधुनिक कृषि तकनीकों और संतुलित उर्वरक उपयोग से इस वर्ष उत्पादन बेहतर होगा और परिवार की आय में भी वृद्धि होगी।
यह सफलता की कहानी दर्शाती है कि किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण खाद, बीज एवं उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहकारी समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। शासन की किसान हितैषी व्यवस्था का लाभ सीधे खेत तक पहुंच रहा है, जिससे सीमांत और छोटे किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है तथा वे अधिक उत्साह के साथ खेती कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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