भीषण गर्मी में आदिवासी गांव में जल संकट, मऊगंज में ग्रामीण बोले- अधिकारियों से कई बार शिकायत की, लेकिन नहीं हुई कार्रवाई

MP News: नल-जल योजना के दावे, आदिवासी विकास की बड़ी-बड़ी बातें और जमीनी हकीकत ऐसी कि महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग आज भी एक-एक बूंद पानी के लिए एक किलोमीटर तक का सफर तय करने को मजबूर हैं. ये हकीकत मऊगंज जिले के हनुमना जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत कला की है. जहां भीषण गर्मी में ग्रामीण पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं. सरकार के दावे कागजों में चमक रहे हैं. लेकिन जमीनी हकीकत में लोग तालाब के सहारे जिंदगी काटने को मजबूर हैं. करीब 60 से 70 परिवारों वाला यह आदिवासी और गरीब बस्ती क्षेत्र आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. पीने का पानी लगभग एक किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है.

गंदे पानी के लिए बच्चों को तालाब में उतरना पड़ता है

भीषण गर्मी के बीच ग्रामीणों के लिए तालाब बना बड़ा सहारा बना हुआ है. कपड़े धोने और दैनिक उपयोग के लिए ग्रामीण तालाब के गंदे पानी पर निर्भर हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि इसी तालाब में छोटे-छोटे बच्चे उतरते हैं और बीमारी के साथ बड़े हादसे का खतरा बना रहता है. ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार सरपंच, जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों से गुहार लगाई गई. आश्वासन भी मिले, कुछ दिनों तक घरों तक पानी पहुंचा लेकिन फिर सपने सूख गए और नल भी बंद हो गए.

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, पानी के लिए हर दिन संघर्ष

सवाल ये है कि आखिर आदिवासी विकास के दावे कहां हैं? सवाल ये है कि करोड़ों की योजनाओं के बावजूद ग्रामीणों को पानी क्यों नहीं मिल पा रहा? क्या विस्तार न्यूज़ की टीम ने जब मौके पर जाकर जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की तो पता चला कि परिवारों में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी को पूरा दिन पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

कैमरे में कैद ये तस्वीरें किसी दूरदराज इलाके की नहीं, बल्कि मऊगंज जिले के ग्राम पंचायत सगहन कला की हैं. यहां आज भी पानी लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बना हुआ है. भीषण गर्मी में महिलाएं सिर पर बर्तन रखकर लगभग एक किलोमीटर दूर महारानी देवी के नल से पानी लाने को मजबूर हैं. छोटे-छोटे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं हर दिन इसी संघर्ष से गुजर रहे हैं. ग्रामीण बताते हैं कि एक समय उम्मीद जगी थी कि अब घरों तक पानी पहुंचेगा. कुछ दिनों तक सप्लाई भी हुई, लेकिन बाद में व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई. अब हालत ये है कि पीने का पानी दूर से लाना पड़ता है, जबकि बाकी जरूरतों के लिए लोग तालाब के गंदे पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी तालाब में बच्चे नहाते हैं, महिलाएं कपड़े धोती हैं और मवेशी भी उतरते हैं.

कई बार शिकायत के बाद भी जिम्मेदार नहीं जागे!

गांव में ना स्थाई जल व्यवस्था है, ना सही रास्ता, और ना ही जिम्मेदारों की कोई चिंता दिखाई दे रही है. ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिले. पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है. जहां आज भी आदिवासी और गरीब परिवार पानी जैसी मूलभूत सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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